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Wednesday, October 23, 2019
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Chhichhore movie review

एक ऐसी फिल्म जिसे हर कॉलेज में रह चुके और नए जाने वाले स्टूडेंट को जरुर देखना चाहिए | ये फिल्म आपको जीवन के बारे में बताने के साथ – साथ हसने पर मजबूर कर देगी | फिल्म में बताया गया है की जीवन में जितना ही सब कुछ नहीं होता |

इस फिल्म में एक दृश्य है- अनिरुद्ध यानी एन्नी अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के दोस्तों के साथ बैठा है। उसका बेटा राघव अस्पताल में जीवन और मौत की लड़ाई रहा है। एन्नी कहता है, ‘मैंने उससे (अपने बेटे) ये तो कहा था कि तेरे सिलेक्ट हो जाने के बाद बाप-बेटे साथ मिलकर शैम्पेन पिएंगे। लेकिन मैंने उससे ये नहीं कहा कि सिलेक्ट नहीं होने पर क्या करेंगे!’ इस सीन के जरिये लेखक और निर्देशक एक जरूरी बात लोगों के सामने रखते कि हैं कि ‘प्लान ए’ से जरा भी कम अहम नहीं है ‘प्लान बी’। अगर आप सिर्फ सफलता को जेहन में रखेंगे, तो असफलता आपको तोड़ देगी।

“कुत्ते की दुम , टेढ़ी की टेढ़ी “

अनिरुद्ध पाठक उर्फ एन्नी (सुशांत सिंह राजपूत) अपने काम में इतना मशगूल हो जाता है कि बाकी सारी चीजें पीछे छूटने लगती हैं। काम की वजह से उसका अपनी पत्नी माया (श्रद्धा कपूर) से अलगाव हो जाता है, जिससे वह कॉलेज के दिनों से बेहद प्यार करता था। एन्नी का बेटा राघव उसी के साथ रहता है। वह इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा है। जब प्रवेश परीक्षा का परिणाम आता है, तो उसका चयन नहीं होता। राघव गहरी हताशा में डूब जाता है। वह ‘लूजर्स’ के ठप्पे के साथ नहीं जीना चाहता और मौत का रास्ता चुन लेता है।

अस्पताल में डॉक्टर (शिशिर शर्मा) एन्नी से कहते हैं कि उसके बेटे में जीने की इच्छा ही नहीं है, जिसके चलते उसकी हालत में सुधार नहीं हो पा रहा है। तब एन्नी बेटे को अपने कॉलेज के दिनों की कहानी सुनाता है और राघव इस कहानी पर विश्वास करे, इसलिए अपने कॉलेज के दोस्तों को ढूंढ़ कर बुलाता है। सेक्सा (वरुण शर्मा), मम्मी (तुषार पांडे), डेरेक (ताहिर राज भसीन), एसिड (नवीन पोलिशेट्टी), बेवड़ा (सहर्ष शुक्ला) अपना सारा काम-धाम छोड़ कर मुंबई पहुंचते हैं और राघव को बताते हैं कि अपने कॉलेज के दिनों में वे सबसे बड़े लूजर्स थे। और इस ठप्पे को हटाने के लिए उन्होंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी…

यह फिल्म ‘दंगल’ के निर्देशक की है, इसलिए अच्छी होगी, ऐसी उम्मीद सबने पहले से लगा रखी थी। और यह फिल्म इस उम्मीद पर खरी उतरती है | इस फिल्म में आप कभी भी बोर नहीं होंगे, बल्कि आपको देखने के बाद एइसा लगेगा की काश ये ३ घंटे की फिल्म होती |

लेखक-निर्देशक अपना संदेश देने में सफल रहे हैं कि जाने-अनजाने अभिभावक अपनी उम्मीदों और महत्वाकांक्षाओं का बोझ अपने बच्चों पर लाद रहे हैं, जिसके तले दब कर बच्चे घुट रहे हैं। करियर और जीवन में थोड़ा पीछे रह गए अभिभावक अपनी दमित और अतृप्त इच्छाओं को अपने बच्चों के जरिये पूरा करने की चाहत में ऐसा कर रहे हैं, तो जो सफल हैं, वे बच्चों को अपनी तरह बनाने के चक्कर में उन पर दबाव डाल रहे हैं। हालांकि दोनों स्थितियों का दुष्परिणाम कमोबेश एक जैसा ही होता है।

फिल्म में अगर कोई कमी है तो संगीत की, पर ये कोई इस तरह की कमी नहीं है जो फिल्म को बर्बाद कर दे | संगीत के बारे में तो आप सोच भी नहीं पाएँगे |

वरुण शर्मा को अब तक ‘फुकरे’ के ‘चूचा’ जैसा किरदार ही मिलते रहे हैं। यह फिल्म भी अपवाद नहीं है। ‘सेक्सा’ नाम ही इसकी तस्दीक कर देता है। लेकिन वरुण की दाद देनी पड़ेगी कि एक ही तरह के किरदारों में भी वे अपनी छाप छोड़ देते हैं। एन्नी के कॉलेज के सीनियर रैगी के नकारात्मक शेड वाले किरदार में प्रतीक बब्बर का काम अच्छा है। बाकी सभी कलाकारों ताहिर राज भसीन, नवीन पोलिशेट्टी, तुषार पांडे, सहर्ष शुक्ला का काम भी अच्छा है।

इस फिल्म को आपको एक बार जरुर देखना चाहिए, मैं इस रिव्यु को लिखने से पहले इस फिल्म को 2 बार देख चूका हूँ | इसमें संदेश भी है और मनोरंजन भी।

निर्देशक: नितेश तिवारी
कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत, श्रद्धा कपूर, वरुण शर्मा, प्रतीक बब्बर, ताहिर राज भसीन, नवीन पोलिशेट्टी, तुषार पांडे, सहर्ष शुक्ला, शिशिर शर्मा

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